Tuesday, 28 April 2020

माय लास्ट डे इन बनारस-अ लेटर टू दी होली सिटी वाराणसी।




प्रिय बनारस,

6 जून, 2017 ये केवल एक तारीख नहीं है। एक तरफ यह वो दिन है जब मैं यहाँ पर आखिरी बार हूँ, वहीं दूसरी तरफ यह एक नई शुरुआत लिए हुए हैं। एक तरफ तीन बरस का सुनहरा अतीत है और एक तरफ बेहतर भविष्य की योजनाएं हैं। जब मैं यहां आया था तो बस अपनी पढ़ाई का एक हिस्सा पूरा करने आया था...और...और ये आज पूरा हो चुका हैं, इसके लिए खुश हूँ।
तो फिर ऐसा क्या है जो ये सब लिखनें को मजबूर कर दे रहा???

इसके पीछे कोई एक वजह नहीं बल्कि वजहों का पूरा समूह है और वो समूह है...तुम....बनारस।
बनारस तुम मेरे लिए बस एक शहर नहीं हो। तुममें शामिल है यहाँ के घाट जिनके साथ मैंने अपना सुख-दुख, प्यार-दर्द, हंसना-रोना, सफलता-असफलता सबकुछ साझा किया है।
प्यार भी यहीं मिला हैं तो कभी दिल भी यहीं टूटा हैं।
सैकड़ो लोगो की भीड़ से घिरा यहाँ पर नुक्कड़ भी किया है,वहीं बहुत बार घाट की सीढ़ियों पर बैठकर सारी रात अकेले ही गुजार दी हैं।

तुममें शामिल है कुछ बेहतरीन और प्यारे लोग जिनसे मैं यहीं पर मिला और उनका होकर रह गया। ये लोग बनारस के ही हैं या मेरी ही तरह यहाँ पर एक छात्र के रूप में आये थे। अगर ये लोग न होते यहाँ तो मैं कभी तुम को अपना दूसरा घर नहीं कह पाता।

तुममें शामिल है लंका जो अड्डा हैं , विश्वविद्यालय परिसर जो मेरे लिए स्वर्ग है, जहाँ सुबह शांत और शाम खूबसूरत होती है; और इसी परिसर में शामिल हैं, ओमकार नाथ ठाकुर प्रेक्षागृह,जहाँ से मैंने रंगमंच के बारें में सीखना शुरू किया; विश्वनाथ मंदिर,जहाँ भोलेनाथ से डाइरेक्ट बात होती थी; बिरला हॉस्टल, वो जगह जहाँ दिनभर हर जगह भटकने के बाद थक-हारकर रात में आते तो ऐसा लगता घर आ गए हों; केंद्रीय पुस्तकालय, जहाँ मेरा सबसे ज्यादा समय गुजरा; कला संकाय, मधुबन,और महिला महाविद्यालय।

तुम में शामिल हैं सारनाथ वह जगह जो बुद्ध और मुझे और करीब ले आया; नागरी नाटक मंडली, इस जगह का महत्व रंगमंच से जुड़े लोग मुझसे बेहतर जानते हैं, स्पंदन,सरस्वती पूजा,कृष्ण-जन्मआष्ट्मी, मालवीय जयंती, सुबह-ए-बनारस, गंगा आरती,घाट-संध्या, शिवरात्रि, होली और तुम्हारी संकरी-लंबी गलियाँ। यहीं सब मिलकर एक वजह बनते है,जिसे कहते हैं......बनारस।

तो इस आखरी दिन की शुरुआत हुई बारिशों की बूंदों से, जिस वक़्त हम फ्रेंच भाषा का पेपर दे रहें थे। लेकिन पेपर से ज्यादा ध्यान हॉस्टल में खुले में सूख रहे कपड़ो का था तो जल्दी पेपर खत्म करके भागे बारिश में ही.....और इसका मजा ही कुछ और होता है। उसके बाद शुरू हुई सबसे भयानक प्रक्रिया जिसे नो ड्यूस कहा जाता है। बारिश और यह दोनो ही अगले तीन घंटो तक साथ-साथ चलते रहे। और इसी बीच vt के छोले-समोसे और चाय भी चलते रहे......और चलती रही एक बाइक जिसपे मैं और शिवम् चौबे इस बारिश में पूरा कैम्पस नाप रहे थे।

आखिरकार बारिश खतम हुई और और नो ड्यूस भी पूरा हुआ। उसके बाद सबकुछ समेटने और कुछ बैग्स में भरने का सिलसिला शुरू हुआ। फिर कुछ मित्र ऐसे भी थे मुझसे भी पहले जाने को थे, तो उन्हें छोड़ के आया लंका तक और फिर खुद के जाने की तैयारी करने लगा। शाम को अचानक से सबकुछ मोह-माया लगने लगा। दिल और दिमाग में जंग चलने लगी। दिमाग से सोचा तो समझ में आने लगा की ये सब जिंदगी का एक हिस्सा हैं लेकिन सिर्फ हिस्सा ही हैं पूरी ज़िन्दगी नहीं। दिल कह रहा था कि....अरे ऐसा भी क्या है फ़ेसबुक, व्हाट्सएप्प तो है ही सब से बात करने के लिए और अभी जा रहे तो क्या साल में दो बार तो पक्का ही बनारस आएंगे।

खैर....रात का भोजन मोर्वी हॉस्टल में किया और निकल पड़े मैं,शिवम् और उत्कर्ष अस्सी घाट इस दिन को और बेहतर और यादगार बनाने के लिए। वहाँ ठंडी-ठंडी हवा बह रही थी,सबकुछ शांत लग रहा था। पर ये शांति हमें आज मंजूर ना थी.....तो उत्पात मचाने हम तीनों कूद गए गंगाजी में, और जब थक गए तो लौट आये वापस अपने हॉस्टल। इन सबके बाद रातभर बातचीत का दौर चलता रहा और साथ ही पैकिंग भी होती रही। रात के आखरी पहर में जब सब कुछ वीराना और चुप सा था........मैं भी चुपचाप सो गया। आखरी पलों में खामोशी ही सबसे ताक़तवर भाषा होती है शायद। इसीलिए मैं,तुम, दोस्त सब खामोश थे।

और जिस तरह तीन साल पहले मैं एक सुबह अचानक इस शहर में चुपके से आ गया था। उसी तरह अचानक एक सुबह चुपके से चला भी गया। बिना किसी से मिले.... क्योंकि जाते हुए मिलना दु:खद होता है।
और.........इस समय जब मैं यह सब लिख रहा हूँ, तब ट्रेन में हूँ जो दौड़ रही हैं मेरे गावँ की तरफ।
सबकुछ तेजी से पीछे छूट रहा है...पेड़,इमारतें,बी एच यू ,घाट,लंका,दोस्त,प्यार,और तुम भी पीछे छूट रहें हो बनारस....!

और बस बाकी रह गया है ये पेड़,इमारतें,बी एच यू ,घाट,लंका,दोस्त,प्यार.....और तुम बनारस।

अलविदा बनारस।






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